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1.नेत्र में पटल (6)

वर्त्म पटल -2
अक्षिगोलक में -4     →(अजा के मॉस में अस्थि हे)

  • Ist पटल- अ जा    →अग्नि और जल आश्रित
  • 2nd पटल-मॉस     →मॉस आश्रित
  • 3rd पटल-में          →मेद
  • 4th पटल-अस्थि     →अस्थि

अक्षिगोलक में ही तिमिर रोग होता हे

2.दोष अनुसार नेत्र रोगों की संख्या (76)

दीदी तेरा सोप दो

  • दी-द-दस(10)
  • दी-द-दस(10)
  • तेरा-तेरा(13)
  • सो-सोहला(16)
  • -पचीस(25)
  • दो-दो(2)

3.शालाक्य तंत्र के विभीन्न तंत्र

काका ने गर्ग को 100 गाली दी विधये निमि कसा

  • का-काकायन तंत्र
  • का -काव्यायेन तंत्र
  • गर्ग  -गार्ग्य तंत्र
  • 100-शौनक भद्र शौनक
  • गाली-गालय
  • विधये-विधये तंत्र
  • निमि-निमि तंत्र
  • -कराल तंत्र
  • सा-सारियायिक तंत्र

4.अधिष्ठान भेद से नेत्र रोगो के प्रकार

ब्रह्मा ने शुक्ला से संधि करके कृष्णगोपाल को द्रष्टि से बहार कर दिया 

  • ब्रह्मा -वर्त्मगत            →वर्तमयी– इक्कीश(21)
  • शुक्ला– शुक्लगत        →शुक्लां– ग्यारह(11)
  • संधि-संधिगत             →संधिनो – नो(9)
  • कृष्णगोपाल-कृष्णगत   →कृष्णश-चार(4)
  • द्रष्टि-द्रष्टिगत               →द्रष्टिगवा-बारहा(12)
  • से-सर्वगत                   →सर्वेषा-षत्रहा(17)
  • बहार-बह्यश्च                 →बह्यशच-दो (2)

5. वर्त्मगत रोग (21) के नाम

1.पोथी और कुम्भी के निमेष में अञ्जन लगाने से पक्ष्म में अर्बुद और वर्त्म में अर्श संग संग होता है
2.विषज शर्करा खाने से कदम्ब का वातअर्श बहने लगा जिससे श्याव किल्नन होकर किलष्ट हो गया 

  • पोथी –पोथकी  
  • कुम्भी-कुम्भीका
  • निमेष-निमेष
  • अञ्जन-अञ्जनामिका
  • लग-लगण
  • पक्ष्म-पक्ष्मकोप
  • अर्बुद-वर्त्मअर्बुद
  • वर्त्म-वर्त्मबंधक
  • अर्श-शुष्कार्श , शोणितार्श
  • संग संग-उत्संगीनी
  • विषज-विसवर्त्म
  • शर्करा-वर्त्मशर्करा
  • कदम्ब-वर्त्मकर्दम
  • वात-वातहतवर्त्म
  • अर्श-अर्शोवर्त्म
  • बहने-बहलवर्त्म
  • श्याव-श्याववर्त्म
  • किल्नन-क्लिन्नवर्त्म , अक्लिन्नवर्त्म
  • किलष्ट-किलष्टवर्त्म

6.शुक्लगत रोग (11) के नाम

अर्जुन दोनों सिराओ से पांचोअर्मो की शुक्ति की पिष्टी बलपूर्वक बनाते है

  • अर्जुन -अर्जुन
  • दो सिरा -सिराजाल सिरापीड़िका
  • पांच अर्म -SSAPS (स्नायु, क्षतज, अधिमांसज, प्रस्तारी, शुक्ल)
  • शुक्ति – शुक्तिका
  • पिष्टी -पिष्टक
  • बल -बलासग्रथित

7.कर्णगत रोग नाम / संख्या (28)

शुना पासा छोड़ के वचा पूत को Because बहरा कृमि प्रत्यक विद्रधि में कण्डु और शोफ करके अर्श को अर्बुद बना देगा |

  • शु-कर्णशूल
  • ना-कर्णनाद
  • पा-कर्णपाक
  • सा-कर्णस्राव
  • छोड़-कर्णक्षडेव
  • वचा-कर्णवच (कर्णगूथ)
  • पूत-पुतिकर्ण
  • बहरा-वाधिर्य
  • कृमि-कृमिकर्ण
  • प्रत्यक-प्रतिनाह
  • 2 विद्रधि– (A)दोषज विद्रधि ,(B)अभिघातज विद्रधि
  •  कण्डु-कर्णकण्डु
  • 4 शोफ– कर्णशोफ(VPKS)
  • 4 अर्श-कर्णअर्श (VPKS)
  • 7 अर्बुद– कर्णअर्बुद (VPKS+ रक्त,मांस,मेद)

8.सुश्रुत के अनुसार कर्णपालि के रोग (5)

परिपोट परिलेही उन उत्पातो से दुखी है

  • परिपोट-परिपोट
  • परिलेही-परिलेही
  • उन-उनमंथ
  • उत्पातो-उत्पात
  • दुखी-दुखवर्धन